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Friendship Essay in Hindi- दोस्ती पर निबन्ध

Friendship Essay in Hindi

हेलो दोस्तों आज हम इस आर्टिकल friendship essay in hindi मतलब की दोस्ती पर निबंध को पढेंगें! दोस्ती इस दुनिया का एक बहुत ही पवित्र रिश्ता है! आज के इस बदलते जबाने में हर किसी को एक सच्चे दोस्त की तलाश रहती है! एक सच्चा दोस्त एक ऐसा शख्स होता है जिससे हम अपनी हर एक बात को शेयर करता है! मै उम्मीद करता हूँ की आपको essay on friendship in hindi मतलब की दोस्ती पर ये बढ़िया निबंध पसंद आयेगा! यदि आपको essay on friendship in hindi पसंद आये तो इसको शेयर जरुर करे! 

Friendship Essay in Hindi- दोस्ती पर निबन्ध

मानव एक सामाजिक प्राणी है! वह इस समाज से अनेक सम्बन्ध स्थापित करता है! यथा माता पिता , भाई बहन , चाचा चाची आदि! लेकिन इन सारे संबंधो से वह सभी प्रकार की बाते नहीं कर सकता क्योकि सभी संबंधो की अपनी अपनी सामाजिक मर्यादा होती है! ऐसी स्तिथी में उसको एक ऐसे सम्बन्ध की जरूरत होती है! जिसके सामने वह अपने आपको निसंकोच स्पस्ट कर सके, खुले दिल से बात कह सके और अपने सुख दुःख की चर्चा बिना किसी संकोच के कर सके!

इस तरह का सम्बन्ध को मित्रता कहलाता है! एक दोस्त हर एक मानव का एक अच्छा साथी होगा! और मानव अपने हर एक बात को अपने दोस्त के साथ शेयर करता है! हर एक मानव का कोई ना कोई दोस्त होता है और वह अपने दोस्त से हर एक वह बात शेयर करता जिसको वह कभी भी किसी के साथ नहीं शेयर करता है! कहा जाता है की जो बात माँ , बहन अथवा पत्नी नहीं जानती है वह बात दोस्त जानता है! 

friendship इस दुनिया का एक बहुत ही पवित्र रिश्ता है! friendship ईश्वर के द्वारा दिया गया एक बहुत ही बढ़िया गिफ्ट है! friendship दो समान विचारधारा वाले व्यक्तियों के बीच स्वय बन जाती है! friendship किसी के बीच में हो सकती है! friendship एक दुसरे के बीच किसी भी तरह का की भेदभाव नहीं रखती है! जाति , धर्म , रूप , रंग , एवं धन जैसी चीज़े friendship के रास्ते में किसी भी प्रकार की कोई रुकावट नहीं पैदा करती है! अगर friendship में जाति , धर्म , रूप , रंग , एवं धन जैसी चीज़े का भेदभाव होता तो श्रीकृष्ण और सुदामा में कभी भी मित्रता नहीं होती! 

मित्रता स्थापित होने के लिए दोनों के बीच खोटा स्वार्थ नहीं होना चाहिये! मित्रता तो दो दिल का निष्ठाम गठबंधन है! इजरायली ने कहा है " मित्रता देवी है और मनुष्य के लिए एक बहुमूल्य वरदान है" प्रसिद्ध दार्शनिक सिसरो ने लिखा है " इस दुनिया में मानव के लिए मित्रता से अधिक कुछ नहीं है" मित्रता की पहचान आपदकाल में होती है! जो मित्र दुःख में तन , मन और धन से साथ दे वही सच्चा मित्र होता है! मित्रता के बारे में महान कवि तुलसीदास ने एक बहुत ही बढ़िया लेख लिखा है! तुलसीदास जी कहते है!-

धीरज धर्म मित्र अरु नारी!
आपत काल परखिय चारी! 

एक सच्चा मित्र अपने मित्र को कष्ट में देखकर दुखी हो जाता है! उसे अपने दोस्त का छोटा से छोटा कष्ट भी पहाड़ सा लगने लगता है! वह अपने दोस्त को बुरे मार्गो से दूर करके अच्छे मार्ग पर लाता है! रामचरित मानस में लिखा है-

निज दुःख गिरिसम रज करी जाना! 
मित्र रूप रज मेरु समाना!!
कुपथ निवारि सुपंथ  चलावा 
गुण प्रकटे अवगुनन्ही  दुरावा !!

एक सच्चा मित्र दूध में मिले पानी की तरह होता है! जो दुध के जलने से पहले खुद ही जलने लगता है! अंग्रेजी में एक बहु प्रसिद्ध कहावत है! जरूरत के समय जो खरा उतरे वही सच्चा दोस्त होता है!

इस भारतीय इतिहास तो आदर्श मित्रो के उदाहरण से भरा पडा है! कृष्ण -सुदामा, कृष्ण-अर्जुन , कर्ण - दुरियोधन, राम-सुग्रीव और राम- बिभीषण की मित्रता इतिहास प्रसिद्ध है! बाल सखा सुदामा जी की दरिद्रता देखकर तीनो लोगो के स्वामी कृष्ण अपने आसुयो से उनका पद प्रछलन करते है! उन्हें अतुल संपदा प्रदान करते है! कृष्ण अपनी गरिमा भूलकर अपने मित्र अर्जुन के सारथी बन उनका रथ संचालन करते है! कर्ण की मित्रता का क्या कहना , जो मित्र दुर्योधन के लिए अपने भाइयो को भी मारने हेतु उधम हो जाता है! सुग्रीव को कष्ट में देखकर भगवान श्रीराम उद्घोषण करते है-

जे न मित्र दुःख होहिदुखारी 
तिनहि बिलोकन पातक भारी!

यही नहीं श्री राम बालि को मारकर अपने दोस्त सुग्रीव को उसका खोया हुआ राज्य वापस दिला देते है! इसी प्रकार अपने मित्र बिभीषण की रछा के लिए श्रीराम अपने जान की बाजी लगा देते है! 

 friendship मतलब की  मित्रता जितनी बहुमूल्य है उसे बनाये रखना उतना ही कठिन है! मित्रता को स्थिर रखने हेतु सबसे जरुरी आवश्यकता उदारता है! हर एक ब्यक्ति में कुछ ना कुछ कमी जरुर रहती है! पूरी तरह से निर्दोष और सर्वगुण सम्पन ब्यक्ति कोई नहीं होता है! इसलिए मित्रो के अवगुणों पर ध्यान नहीं देना चाहिये अन्यथा दोषपूर्ण दर्शन और एक दुसरे पर छीटाकशी से दोस्ती में दरार पैदा होने का भय बना रहता है! चाणक्य नीति के अनुसार मित्र से बहश करना , उधार लेने देने और उसकी स्त्री से अकेले में बातचीत करना - ये तीनो बातें मित्रता में बिगाड़ पैदा कर देती है!

आज भौतिकवादी युग है! इस युग में सच्चे मित्र का मिलना बहुत कठिन है! अधिकांश मित्र अपना उल्लू सीधा करने के लिए मित्रता का स्वांग  रचते है! और अपना काम बन जाने के बाद अंगूठा दिखाकर चलते बनते है! ऐसे मित्र सामने तो प्रिय बोलते है! लेकिन पीछे विष वमन करते है! अत: शास्त्रों का मत है की जो मित्र सिर्फ मुख में अमृत और सम्पूर्ण भाग विष में भरे घट के समान रखते है! वे पूर्णत: त्याज्य है! इस सम्बन्ध में तुलिदास लिखते है! 

आगे कह वचन बनाई !
पीछे अनहित मत कुटलाई! 
जाकर चित अहिगति सम भाई!
अस कुमित्र परीहरहिं भलाई!

मित्रो का चुनाव करने में बड़ी सवाधानी बरतनी चाहिये! इस सम्बन्ध में पापुलर दार्शनिक कंफियुसियान का कहना है! " ऐसे मानव से मित्रता ना करो , जो तुमसे बढ़िया ना हो! " सज्जनों की मित्रता जहाँ सुखदाई है वही दुर्जनों की मित्रता कष्टदाई होती है! इसलिए हमको हमेसा अच्छे मित्र की खोज करनी चाहिये! और उन मित्रो को स्थायी और स्थिर बनाने के लिए पूरा पूरा प्रयाश करना चाहिये! क्योकि सच्चे को पाना वास्ताव में सच्ची सम्पति है! गाँधी जी हमेसा कहा करते थे! सच्चा मित्र मिल जाना मनुष्य के लिए दैवी बरदान है! राष्ट्कवि  रामधारी सिंह दिनकर जी कहते है! 

मित्रता बड़ा अनमोल रतन 
कब इसे तौला सकता है धन!

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