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Jaishankar Prasad Poems in Hindi | जयशंकर प्रसाद की हिन्दी कवितायेँ

Jaishankar Prasad Poems in Hindi

हेलो दोस्तों आज हम इस आर्टिकल में Jaishankar Prasad Poems in Hindi मतलब की जयशंकर प्रसाद की सबसे बढ़िया हिन्दी कविता को पढ़ेगें! जयशंकर प्रसाद भारत के एक बहुत ही महान कवि थे! जयशंकर प्रसाद की कविता आज भी हमारे दिलो पर राज करती है! आज के समय में हिंदी के हर एक बुक में आपको जयशंकर प्रसाद की कवितायेँ पढने को मिल जायेंगी! जयशंकर प्रसाद भारत के उन कवियों में से एक थे जो अपने कविता के माध्यम से अपनी हर एक बात को बहुत ही सरल तरीके से पेश कर देते है! जयशंकर प्रसाद की कवितायेँ प्रेरणा से भरी होती है! जयशंकर प्रसाद की कविता से आपको कुछ ना कुछ नया जरुर सिखने को मिलता है! 

Jaishankar Prasad Poems in Hindi | जयशंकर प्रसाद की कवितायेँ

आज हम इस आर्टिकल में जयशंकर प्रसाद की कुछ बहुत ही बेहतरीन कविता को पढ़ेगें! मुझे पूरी उम्मीद है की आपको जयशंकर प्रसाद की ये सभी कविता पसंद आएगी! यदि आपको Jaishankar Prasad Poems in Hindi पसंद आये तो इस पोस्ट को शेयर करें! Jaishankar Prasad Poems in Hindi के बारे में आप अपने विचार को हमारे साथ ईमेल के द्वारा शेयर कर सकते है!

Jaishankar Prasad Poems- भारत महिमा 

हिमालय के आँगन में उसे, प्रथम किरणों का दे उपहार ।
 उषा ने हँस अभिनंदन किया, और पहनाया हीरक-हार ।।

 जगे हम, लगे जगाने विश्व, लोक में फैला फिर आलोक ।
 व्योम-तुम पुँज हुआ तब नाश, अखिल संसृति हो उठी अशोक ।।

 विमल वाणी ने वीणा ली, कमल कोमल कर में सप्रीत ।
 सप्तस्वर सप्तसिंधु में उठे, छिड़ा तब मधुर साम-संगीत ।।

 बचाकर बीच रूप से सृष्टि, नाव पर झेल प्रलय का शीत ।
 अरुण-केतन लेकर निज हाथ, वरुण-पथ में हम बढ़े अभीत ।।

 सुना है वह दधीचि का त्याग, हमारी जातीयता का विकास ।
 पुरंदर ने पवि से है लिखा, अस्थि-युग का मेरा इतिहास ।।

 सिंधु-सा विस्तृत और अथाह, एक निर्वासित का उत्साह ।
 दे रही अभी दिखाई भग्न, मग्न रत्नाकर में वह राह ।।

 धर्म का ले लेकर जो नाम, हुआ करती बलि कर दी बंद ।
 हमीं ने दिया शांति-संदेश, सुखी होते देकर आनंद ।।

 विजय केवल लोहे की नहीं, धर्म की रही धरा पर धूम ।
 भिक्षु होकर रहते सम्राट, दया दिखलाते घर-घर घूम ।

 यवन को दिया दया का दान, चीन को मिली धर्म की दृष्टि ।
 मिला था स्वर्ण-भूमि को रत्न, शील की सिंहल को भी सृष्टि ।।

 किसी का हमने छीना नहीं, प्रकृति का रहा पालना यहीं ।
 हमारी जन्मभूमि थी यहीं, कहीं से हम आए थे नहीं ।।

 जातियों का उत्थान-पतन, आँधियाँ, झड़ी, प्रचंड समीर ।
 खड़े देखा, झेला हँसते, प्रलय में पले हुए हम वीर ।।

 चरित थे पूत, भुजा में शक्ति, नम्रता रही सदा संपन्न ।
 हृदय के गौरव में था गर्व, किसी को देख न सके विपन्न ।।

 हमारे संचय में था दान, अतिथि थे सदा हमारे देव ।
 वचन में सत्य, हृदय में तेज, प्रतिज्ञा मे रहती थी टेव ।।

 वही है रक्त, वही है देश, वही साहस है, वैसा ज्ञान ।
 वही है शांति, वही है शक्ति, वही हम दिव्य आर्य-संतान ।।

 जियें तो सदा इसी के लिए, यही अभिमान रहे यह हर्ष ।
 निछावर कर दें हम सर्वस्व, हमारा प्यारा भारतवर्ष ।।



Jaishankar Prasad Poems- 2 सब जीवन बीता जाता है 

सब जीवन बीता जाता है
 धूप छाँह के खेल सदॄश
 सब जीवन बीता जाता है

 समय भागता है प्रतिक्षण में,
नव-अतीत के तुषार-कण में,
हमें लगा कर भविष्य-रण में,
आप कहाँ छिप जाता है
 सब जीवन बीता जाता है

 बुल्ले, नहर, हवा के झोंके,
मेघ और बिजली के टोंके,
किसका साहस है कुछ रोके,
जीवन का वह नाता है
 सब जीवन बीता जाता है

 वंशी को बस बज जाने दो,
मीठी मीड़ों को आने दो,
आँख बंद करके गाने दो
 जो कुछ हमको आता है

Jaishankar Prasad Poems- आह ! वेदना मिली विदाई 

आह ! वेदना मिली विदाई
 मैंने भ्रमवश जीवन संचित,
मधुकरियों की भीख लुटाई।

 छलछल थे संध्या के श्रमकण,
आँसू-से गिरते थे प्रतिक्षण,
मेरी यात्रा पर लेती थी
 नीरवता अनंत अँगड़ाई।

 श्रमित स्वप्न की मधुमाया में,
गहन-विपिन की तरु छाया में,
पथिक उनींदी श्रुति में किसने
 यह विहाग की तान उठाई?

लगी सतृष्ण दीठ थी सबकी,
रही बचाए फिरती कब की,
मेरी आशा आह ! बावली
 तूने खो दी सकल कमाई।

 चढ़कर मेरे जीवन-रथ पर,
प्रलय चल रहा अपने पथ,
मैंने निज दुर्बल पद-बल पर
 उससे हारी-होड़ लगाई।

 लौटा लो यह अपनी थाती,
मेरी करुणा हा-हा खाती,
विश्व ! न सँभलेगी यह मुझसे
 इसने मन की लाज गँवाई।


Jaishankar Prasad Poems- आत्‍मकथ्‍य 


मधुप गुन-गुनाकर कह जाता कौन कहानी अपनी यह,
मुरझाकर गिर रहीं पत्तियाँ देखो कितनी आज घनी।
 इस गंभीर अनंत-नीलिमा में असंख्‍य जीवन-इतिहास,
यह लो, करते ही रहते हैं अपने व्‍यंग्‍य मलिन उपहास,
तब भी कहते हो-कह डालूँ दुर्बलता अपनी बीती।

 तुम सुनकर सुख पाओगे, देखोगे-यह गागर रीती,
किंतु कहीं ऐसा न हो कि तुम ही ख़ाली करने वाले,
अपने को समझो, मेरा रस ले अपनी भरने वाले।
 यह विडंबना! अरी सरलते हँसी तेरी उड़ाऊँ मैं,
भूलें अपनी या प्रवंचना औरों की दिखलाऊँ मैं।

 उज्‍ज्‍वल गाथा कैसे गाऊँ, मधुर चाँदनी रातों की,
अरे खिल-खिलाकर हँसने वाली उन बातों की,
मिला कहाँ वह सुख जिसका मैं स्‍वप्‍न देखकर जाग गया।
 आलिंगन में आते-आते मुसक्‍या कर जो भाग गया,
जिसके अरूण-कपोलों की मतवाली सुन्‍दर छाया में,
अनुरागिनी उषा लेती थी निज सुहाग मधुमाया में।

 उसकी स्‍मृति पाथेय बनी है थके पथिक की पंथा की,
सीवन को उधेड़ कर देखोगे क्‍यों मेरी कथा की?
छोटे से जीवन की कैसे बड़ी कथाएँ आज कहूँ?
क्‍या यह अच्‍छा नहीं कि औरों की सुनता मैं मौन रहूँ?
सुनकर क्‍या तुम भला करोगे मेरी भोली आत्‍मकथा?
अभी समय भी नहीं, थकी सोई है मेरी मौन व्‍यथा।


Jaishankar Prasad Poems- ले चल वहाँ भुलावा देकर 

ले चल वहाँ भुलावा देकर
 मेरे नाविक ! धीरे-धीरे ।

जिस निर्जन में सागर लहरी,
अम्बर के कानों में गहरी,
निश्छल प्रेम-कथा कहती हो-
तज कोलाहल की अवनी रे ।
 जहाँ साँझ-सी जीवन-छाया,
ढीली अपनी कोमल काया,
नील नयन से ढुलकाती हो-
ताराओं की पाँति घनी रे ।


जिस गम्भीर मधुर छाया में,
विश्व चित्र-पट चल माया में,
विभुता विभु-सी पड़े दिखाई-
दुख-सुख बाली सत्य बनी रे ।
 श्रम-विश्राम क्षितिज-वेला से
 जहाँ सृजन करते मेला से,
अमर जागरण उषा नयन से-
बिखराती हो ज्योति घनी रे !



Jaishankar Prasad Poems- चित्राधार


कानन-कुसुम -
पुन्य औ पाप न जान्यो जात।
 सब तेरे ही काज करत हैं और न उन्हे सिरात ॥
 सखा होय सुभ सीख देत कोउ काहू को मन लाय।
 सो तुमरोही काज सँवारत ताकों बड़ो बनाय॥
 भारत सिंह शिकारी बन-बन मृगया को आमोद।
 सरल जीव की रक्षा तिनसे होत तिहारे गोद॥
 स्वारथ औ परमारथ सबही तेरी स्वारथ मीत।
 तब इतनी टेढी भृकुटी क्यों? देहु चरण में प्रीत॥

 छिपी के झगड़ा क्यों फैलायो?
मन्दिर मसजिद गिरजा सब में खोजत सब भरमायो॥
 अम्बर अवनि अनिल अनलादिक कौन भूमि नहि भायो।
 कढ़ि पाहनहूँ ते पुकार बस सबसों भेद छिपायो॥
 कूवाँ ही से प्यास बुझत जो, सागर खोजन जावै-
ऐसो को है याते सबही निज निज मति गुन गावै॥
 लीलामय सब ठौर अहो तुम, हमको यहै प्रतीत।
 अहो प्राणधन, मीत हमारे, देहु चरण में प्रीत॥



Jaishankar Prasad Poems- 

 ऐसो ब्रह्म लेइ का करिहैं?
जो नहि करत, सुनत नहि जो कुछ जो जन पीर न हरिहै॥
 होय जो ऐसो ध्यान तुम्हारो ताहि दिखावो मुनि को।
 हमरी मति तो, इन झगड़न को समुझि सकत नहि तनिको॥
 परम स्वारथी तिनको अपनो आनंद रूप दिखायो।
 उनको दुख, अपनो आश्वासन, मनते सुनौ सुनाओ॥
 करत सुनत फल देत लेत सब तुमही, यहै प्रतीत।
 बढ़ै हमारे हृदय सदा ही, देहु चरण में प्रीत॥

 और जब कहिहै तब का रहिहै।
 हमरे लिए प्रान प्रिय तुम सों, यह हम कैसे सहिहै॥
 तव दरबारहू लगत सिपारत यह अचरज प्रिय कैसो?
कान फुकावै कौन, हम कि तुम! रुचे करो तुम तैसो॥
 ये मन्त्री हमरो तुम्हरो कछु भेद न जानन पावें।
 लहि 'प्रसाद' तुम्हरो जग में, प्रिय जूठ खान को जावें॥


Jaishankar Prasad Poems- बीती विभावरी जाग री 


बीती विभावरी जाग री!
 अम्बर पनघट में डुबो रही-
 तारा-घट ऊषा नागरी।

 खग-कुल कुल-कुल-सा बोल रहा,
किसलय का अंचल डोल रहा,
 लो यह लतिका भी भर ला‌ई-
 मधु मुकुल नवल रस गागरी।

 अधरों में राग अमंद पिए,
अलकों में मलयज बंद किए-
 तू अब तक सो‌ई है आली!
 आँखों में भरे विहाग री।


Jaishankar Prasad Poems- तुम कनक किरन 


तुम कनक किरन के अंतराल में
 लुक छिप कर चलते हो क्यों ?

नत मस्तक गर्व वहन करते
 यौवन के घन रस कन झरते
 हे लाज भरे सौंदर्य बता दो
 मौन बने रहते हो क्यो?

अधरों के मधुर कगारों में
 कल कल ध्वनि की गुंजारों में
 मधु सरिता सी यह हंसी तरल
 अपनी पीते रहते हो क्यों?

बेला विभ्रम की बीत चली
 रजनीगंधा की कली खिली
 अब सांध्य मलय आकुलित दुकूल
 कलित हो यों छिपते हो क्यों?


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